Wednesday, March 4, 2020

बेलगाम भीड़तंत्र और देश की गंगा जमुनी तहजीब

उत्तर-पूर्व दिल्ली के भजनपुरा स्थित चांद बाबा की जली हुयी मजार पर दोबारा हिंदू औरतों को सजदा करते देखकर यही लगता है कि सियासत और दंगाईयों की तमाम साज़िशों को इस देश की गंगा-जमनी तहजीब ने एक बार फिर से नाकाम कर दिया है।शायर अजमल सुल्तानपुरी,मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान,जिसको तलाशते-तलाशते इस दुनियां से चले गये।सच मे उनका वह हिंदुस्तान चांद बाबा की मजार पर ही दिख गया।चांद बाबा की मज़ार सदियों से सभी धर्मों के लोगों की आस्था का केंद्र रहा यह मज़ार पिछले दिनों दिल्ली मे हुए दंगे के दौरान दंगाईयों द्वारा आग के हवाले कर दिया गया था।हालात में सुधार होते ही वहां सजदा करने पहुंची हिन्दू औरतों को देखकर सियासत और दंगाईयों की तमाम साज़िशों के बीच भी यह उम्मीद जागती है कि इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब लोगों के दिलों में हमेशा की तरह आज भी जिंदा है।यहां दिखता है कि अंधेरे हार गए और जिंदाबाद है हिन्दोस्तान। जब हम बात सूफी संतों की करते हैं तो हिन्दुस्तान की उस गंगा-जुमनी तहजीब की अदावत मुखर हो उठती है जहां हिन्दू और मुसलमान दोनों एक साथ सिर झुकाते हैं।


                            हमारे देश में इस सूफी परम्परा ने एक मिश्रित संस्कृति को जन्म दिया है। दरअसल इतिहासकारों और अन्य साहित्यकारों ने सूफी शब्द की अपनी-अपनी अगल परिभाषाएं गढ़ी हैं।परन्तु मूल रूप से सूफी अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका मतलब है दिल का स्वच्छ होना।वास्तव में सूफी शब्द वो है जिसमें हिन्दुस्तान का दर्द छुपा है जहां दो धर्मों यानि हिन्दुओं और मुसलमानों ने एक होना सीखा। सूफी संतों की परम्परा में हिन्दुस्तान में सबसे पहला और प्रसिद्ध नाम ख्वाजा मुईद्दीन चिश्ती का आता है जिन्हे हम गरीब नवाज आदि नामों से जानते हैं। इसी श्रेणी में एक नाम दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया का भी है,जिनकी शोहरत तुगलक वंश के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से भी ज्यादा थी।निजामुद्दीन औलिया की दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहे। परन्तु अंत में दिल्ली शहर से दूर गयासपुर में अपना खानकाह बनाया। जिनके यहां हर धर्म के लोगों को खाना खिलाया जाता था।जहां हमेशा अमीर-गरीबों का जमावड़ा लगा रहता था।अक्सर प्रजा की भलाई के लिएखुदा की इबादत के लिए,अन्य सामाजिक कार्यों के लिए इन खानकाहों का बेहतर इस्तेमाल हुआ।सूफी संतों की दयानतदारी की पूरी दुनिया कायल रही है।नृत्य-संगीत के माहौल में इबादत की पद्धति ने उपासना को बेहद सहज बना दिया।शायद यही वजह है कि सदियों से मेल-मिलाप और भाईचारे की इस तहज़ीब को जिंदा रखने में धर्मों के झंडाबरदारों की नहींसूफी संतों के मज़ारों और दरगाहों की बड़ी भूमिका रही है।
                                  मंदिरों- मस्जिदों की धार्मिकता से अलग ये ऐसी जगहें हैं जहां सभी धर्मों के लोग एक साथ एकत्र होकर अपनी श्रद्धा का निवेदन करते हैं।जहां से आवाज आती हो कि मजा दामान- ए - मादर का है इस मिट्टी के दामन मे।ताज्जुब है कि जिस दिल्ली का महान सूफी संतों से नाता रहा हो,चांद बाबा की छोटी सी मजार बड़ा आकर्षण का केंद्र रही हो और इस मज़ार पर बैठने से जाति और धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत के स्पर्श से आने वाली खुशबू महसूस की जाती हो।उसी दिल्ली मे महज पांच और नौ साल के दो मासूमों को दंगाईयों से अपनी जान बचाने के लिए मकान की पहली मंजिल से नीचे कूदना पड़ा।पड़ोसियों के कहने पर 55 साला दादी को कलेजे पर पत्थर रखकर इन को नीचे पड़ोसियों को लपकवाना पड़ा।इसके उलट इसी दिल्ली मे फरीश्ते भी दिखे,जिन्होने मंदिर भी बचाई और मस्जिद की भी हिफाजत की है।कायम को बचाया तो ललित को भी नई जिंदगी मिली।जुबैर साकुशल घर पहुंचे तो मोहन भाई ने भी मुस्लिम मोहल्ला अपने दोस्त अतीक के साथ बेखौफ पार किया।इस सबके बावजूद राजधानी दिल्ली में सरेआम हुयी जानलेवा हिंसा आज भी तमाम सवाल खड़े कर रही है।मानवता को तिलांजलि देइंसानी रिश्तों को किसने जलाया।इन दंगों का जिम्मेदार कौनएक पल में कई परिवारों की खुशियां छिन गईंजिन घरों में पत्थरपेट्रोल बम मिले हैंवह वहां तक कैसे पहुंचेवक्त रहते इन बातों का पता क्यों नहीं चल पाया?
                                    सवाल तो अनेक हैंमगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली को दहलाने वाले इन दंगों को अंजाम देने वालों तक क्या कानून की पकड़ हो पायगी इन दंगों में चार दर्जन से अधिक लोगों की मौत का जिम्मेदार आखिर कौन हैऔर तो और दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल और इंटेलीजेंस ब्यूरो के एक अफसर भी इन दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं जो कि इन दंगों को ही रोकने गए थे। उनका यह बलिदान आखिर किस कारणदुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा भीड़तंत्रकैसे पनपा वह भी देश की राजधानी जैसी जगह मे।भीड़तंत्र को रोकने मे जिम्मेदार अमला कैसे नाकाम हुआ। कौन थे वो लोग जो इस देश में अमन शांति कायम नहीं देखना चाहते।ये सवाल तमाम देशवासियों से है।सवाल सियासतदानों पर कि वो ऐसे भड़काऊ बयान कैसे दे सकते हैं।सवाल दिल्ली पुलिस पर कि वो तीन दिन तक हालात क़ाबू करने की स्थिति में क्यों नहीं थी और सवाल हाथ में पत्थर लिए लोगों पर भी कि इतनी हिंसा को उन्होंने अपने भीतर पलने कैसे दिया?सवाल उनसे जो बेखौफ सड़कों पर असलहे लहरा रहे थे।ये भी सावल है कि जिस दिल्ली का सदियों तक सूफीयों का साथ रहा हो उस दिल्ली में लोगों को किसने भड़काया? यह सवाल उन तमाम मासूमों,माओं,बेवाओं और परिजनों की आंखों से गिरते आंसू कर रहे हैं,जिनके अपने अब इस दुनियां मे नही रहे।ये सवाल उस ढ़ाई साल की मासूम बच्ची का भी है जिसकी सूनी आंखेंबंदजुबान और उदास चेहरा दंगें मे बिछड़े मे अपने मां बाप को लगातार तलाश रही हैं।वह भगदड़ के दौरान शिव विहार मे सऊद आलम को मिली थी।उन्हें उसका मजहब नही मालूम,तंगहाली मे जी रहे सऊद के लिए उसकी परवरिश भी एक सवाल है।इन सवाल दर जवाब के लिए अब  राजनीति शुरू हो गई है।
                                    दरअसल देश की शान दिल्ली इसके लिए नही जानी जाती थी।वह जानी जाती थी जहां देश के हर कोने से कोई न कोई अपनी रोजी रोटी के लिए आता है और जहां हर हाथ को कोई न कोई काम मिल भी जाया करता था।दिल्ली की पहचान थी कि जहां विभाजन और विस्थापन के गहरे जख्म लेकर लाखों लोग आए और यहां की सरकार से सहायता पाकर न सिर्फ अपने पैरों पर खड़े हुए बल्कि मुल्क को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अपना अहम योगदान दिया।सच मे ये यह वो दिल्ली थी जहां देश के किसी भी कोने से दुखियारा व्यक्ति इंसाफ की गुहार लेकर आता है और उसे किसी न किसी रूप में इंसाफ मिल ही जाता था।भाई अमन की ये दिल्ली थी अपने बड़े बड़े सपने लेकर यहां आने वालों की,जो अपने सपने पूरे कर कस्बे और गांव के नवजवानों के नायक बन जाते थे।ये वह दिल्ली थी जहां हर साल 15 अगस्त को लाल किले मे आजादी जश्न मनाया जाता है और 26 जनवरी को हमारी लोकतांत्रिक विविधता मे अनेकता की अदभुत छटा दिखाई जाती है।उम्मीद के मुताबिक हिंदू-मुस्लिम भाईचारे में यकीन रखने वाली दिल्ली शांति के पथ पर चल कर फिर सरपट दौड़ने लगी है,खुशी है।दरअसल दिल्ली हिंसा आकस्मिक नहीं है और न ही इसका तात्कालिक कारण धर्म से जुड़ी कोई इमारत मंदिर या मस्ज़िद है।न तो यह मुहर्रम या दशहरे से जुड़े किसी उन्मादी जुलूस के बीच आपसी टकराव का नतीजा है और न ही होली,बकरीद से जुड़ी किसी घटना से।
                                               इस लिए दंगों के पीछे का सच भी जल्द सामने आए।दिल्ली में हुई हिंसा का जब विश्लेषण किया जाए तो इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए।ऐसा करते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दंगे अपने आप नहीं होते।दंगे खुद में अराजकता के प्रतीक होते हैं।दंगों से न सिर्फ सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है बल्कि यह समाज के आर्थिक ढांचे को भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त करता है।दंगे हमेशा ही दो वर्गों के बीच होते हैं और जब भी दंगे होते हैं इसमें निर्दोष सबसे ज्यादा मारे जाते हैं।गरीबों की रोजी रोटी बुरी तरह प्रभावित होती है।इस सब के बावजूद ये साफ हो गया कि आज भी भारत जैसे महान देश के लिए हजारों साल पुरानी सूफी संतों की परम्परओं का पालन जरूरी है।देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसी बात को कहतें हैं।उन्होने अजमेर शरीफ में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर ख्वाजा साहब के 808 वें वार्षिक उर्स के अवसर अपनी ओर से चढ़ाई गयी चादर के अवसर पर एक संदेश भेजा था।उसमें पीएम मोदी ने कहा कि भारत समृद्ध आध्यात्मिक परम्पराओं का देश है और हमारे देश के सूफी-संतों ने अपने आदर्शों और विचारों के माध्यम से राष्ट्र के सांस्कृतिक ताने-बाने को सदैव मजबूत करने का प्रयास किया है।शांति और एकता का उनका पैगाम हमें जीवन में अनुशासित,शालीन और संयमित रहने की सीख देता है।काबिलेगौर है कि प्रधानमंत्री मोदी की ओर से केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने यह चादर चढ़ाई थी।इस अवसर पर नकवी ने कहा कि एकता और सौहार्द की ताकत ही पंथनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक भारत की आत्मा है।बहरहाल अब ये साफ है कि हिंसा और नफरत की दिशा में हुआ दिल्ली का यह बदलाव न तो दिल्ली के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए।इस लिए इन मामलों की निष्पक्ष जांच तो होनी ही चाहिए।

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